आखिर जिस बात का डर था वही हुआ, एक पूरी पीड़ी बरबादी के मुहाने पर खड़ी खुद को बचाने की गुहार लगा रही है !
कोटद्वार में सैकड़ों नहीं अब ऐसे परिवारों की संख्या हज़ारों में है जो स्मैक या ड्रग्स की लत से जूझ रहे अपने बच्चों को तिल तिल मरता देखने को मजबूर हैं लेकिन कोई उपाय नजर नहीं आ रहा है।
1-2 वर्ष पहले किशोरियों और लड़कियों में इसका प्रभाव बेहद कम था लेकिन अचानक से नशे की गिरफ्त में फंसी किशोरियों और छात्राओं की संख्या में बेतहाशा वृद्धि ने विषय को चिंताजनक से कहीं ज्यादा भयावह बना दिया है ।
जो कल तक दोस्तों के साथ शौक में नशा कर रहे थे अब नशे के आदी हो गए हैं, माध्यम वर्गीय परिवारों से हैं तो नशे के लिए जरूरी पैसे जुटाने के लिए पहले तो अपने ही घरों में चोरी की और जब उससे भी गुजारा नहीं हुआ तो खुद ड्रग पैडलर बन अन्जाने में ही नशे के अंतर्राज्यीय सिंडीकेट का हिस्सा बन गए ।
उत्तराखण्ड पुलिस ड्रग डीलर पर करवाई करने और सप्लाई चेन तोड़ने, नशे की गिरफ्त में आकण्ठ डूबे युवा वर्ग की मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग के बजाय सिर्फ उन्हीं को गिरफ्तार कर रही है जो खुद ड्रग्स माफिया के षड्यंत्र का न सिर्फ शिकार हैं बल्कि इन्हें तो सोची समझी रणनीति के तहत इस काले कारोबार का हिस्सा बनाया गया है।
कोटद्वार-भाबर ही नहीं उत्तराखण्ड की तराई के बड़े शहर, कस्बे और ग्रामीण इलाकों के साथ ही पर्वतीय क्षेत्रों के अधिकांश ग्रामीण शहरों में स्मैक, हीरोइन, चरस और गांजे ने युवा और किशोर वर्ग में अन्दर तक पैठ बना ली है ! कोटद्वार-भाबर क्षेत्र का कोई भी विद्यालय और उसके छात्र-छात्राएं स्मैक से अन्जान नहीं रहे, हो सकता है किसी संस्थान में प्रभाव कम, ज्यादा या फिर शुरुआती दौर में हो लेकिन संक्रमण सब जगह फ़ैल चूका है ।
इन 3-4 वर्षों में स्मैक जैसे ड्रग्स और नशीली दवाओं का काला व्यापार किशोर छात्र-छात्राओं के बीच खूब फला फूला है, या यूँ कहें कि कोटद्वार ड्रग माफिया का अड्डा बन गया है या बनवा दिया गया है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।
कोटद्वार तो महज एक उदाहरण है उत्तराखण्ड में पैर पसार चुके स्मैक, हीरोइन और ड्रग्स के दुष्प्रभाव का, देहरादून, हरिद्वार, रुड़की, ऋषिकेश, रामनगर, काशीपुर, रुद्रपुर, हल्द्वानी सहित तराई के विभिन्न कस्बों के साथ ही नैनीताल, श्रीनगर, टेहरी, गोपेश्वर, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी और पौड़ी जैसे पहाड़ी उपनगर भी इस संक्रमण से अछूते नहीं रह गए ।
कमोबेश कुछ वर्षों पहले तक मैं भी उत्तराखण्ड को बेहद शांत इलाका मानता था लेकिन अब पहाड़ी प्रदेश उत्तराखण्ड के बर्फ से धवल और सर्द वातावरण में नशे और अपराध का सामाजिक प्रदूषण काफी गहरी पैठ बना चूका है । ये भी सच है कि ड्रग एडिक्शन को लेकर उत्तराखण्ड के हालात पंजाब से बुरे नहीं हैं लेकिन मौजूदा हालात में पंजाब से कम भी नजर नहीं आते । प्रदेश सरकार भी अपरोक्ष रूप से शायद उत्तराखण्ड को इसी दिशा में बड़ते देखना चाहती है यही वजह है कि राज्य स्तर पर भयावह रूप ले चुकी ड्रग्स और नशे की समस्या का कोई रोड मैप बनता नजर नहीं आ रहा शायद एक उड़ता पंजाब जैसे प्रयोग की सख्त जरूरत है या फिर तमाशाई बन पंजाब जैसे बदतर हालातों तक सब्र करना होगा कि कोई आएगा फ़िल्म बनाएगा और फिर वही ढाक के तीन पात ! राज्य सरकार को चाहिए कि वो ड्रग्स माफिया के खिलाफ निर्णायक करवाई के लिए गृह मंत्रालय और नारकोटिक्स कन्ट्रोल ब्यूरो को अनुरोध पत्र भेज बड़े स्तर पर साझा करवाई की मांग करे साथ ही नशे से पीड़ित युवाओं के लिए जिला स्तर पर मनोवैज्ञानिक परामर्श व् उपचार केंद्र स्थापित करे।
भारत में अत्तीत के गौरवशाली स्मारकों और धरोहरों की स्थिति आज अत्यंत चिंताजनक हो गयी है, हम आधुनिक शिक्षा, और तकनीकी के बल पर तब तक देश को विकसित और अग्रणी नहीं बना सकते जब तक हम अपने गौरवशाली अतीत और इतिहास का सम्मान करना न सीख जाएँ!आज के दौर में जब हम भुमंदालिकरण के संक्रामक दौर से गुजर रहे हैं ऐसे में तब यह और भी जरूरी हो जाता है कि हम अपनी संस्कृति और गौरवशाली इतिहास को आने वाली पिडियों तक पहुंचाए जिससे वो अपने इस देश के मान - सम्मान का परिचय प्राप्त कर सकें और"भारतीय होने पर गर्व कर सकें" !
Tuesday, June 28, 2016
नशे से पस्त उत्तराखण्ड
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment