ये बात शायद कम ही लोग जानते हैं की महाराजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भारत के नाम से ही अपने देश का नाम भारत हुआऔर इस चक्रवर्ती सम्राट का जन्म हिमालय की सुरम्य घाटियों और भाबर के संगम में मालिनी नदी के तट पर कण्वाश्रम में हुआ था ! इतिहास के स्वर्णिम काल में कण्वाश्रम शिक्षा, और संस्कृति का गौरवशाली केंद्र था जहाँ के गुरुकुल में देश विदेश के हजारों छात्र अध्ययन करने आते थे..
अगर कहें की तब के दौर में भारत को विश्वगुरु बनाने में कण्वाश्रम से निकले विचारों और विद्यार्थियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी ! लकिन ये अत्यंत दुःख का विषय है जिस स्थान ने अतीत में भारत को सांस्कृतिक और शेक्षणिक मार्गदर्शन दिया वर्त्तमान में वह अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है ! उत्तराखंड के पौढ़ी जनपद के कोटद्वार नगर के पास स्थित कण्वाश्रम अपने पुन:जागरण के बाट जोह रहा है !

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