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Sunday, May 13, 2012

Mothers Day : ममता का कर्ज चुकाने का प्रयास


जिसके लिए पूरा जन्म कम उसके लिए सिर्फ एक ही दिन क्यों..?

आज पूरे विश्व में लोग मातृ दिवस  (MOTHERS DAY)  को धूम-धाम से मनाकर माँ के ममतामयी त्याग और समर्पण  का स्मरण कर अपनी कृतज्ञता ज्ञापित कर रहे हैं ! अचानक  से ख़ास बन गये साल के इस दिन पर  मुझे भी फोन और सोशियल साइट्स  पर कई मैसेज आये जिसमे माँ की महिमा को उद्धृत कर मदर्स डे की शुभकामनाएं प्रेषित की गयी थी !  इन संदेशों को पड़कर मुझे अच्छा  लगा, अच्छा इसलिए कि आजकल के भौतिकवादी समय में भी लोग माँ और उसके शिशु के बीच के पवित्र ममतामयी संबंधों की समीक्षा कर रहे हैं, लेकिन फिर आश्चर्य भी हुआ कि जिस देश में माँ को देवतुल्य माना जाता है क्यों इस तरह का त्यौहार मनाकर उसकी महिमा के प्रति विशुद्ध व्यावसायिक  जन-जागरण कार्यक्रम चलाया जा रहा है ..! दरअसल विदेशों में  इस तरह के असामाजिक त्यौहार का प्रचलन संबंधों की व्यावसायिक मार्केटिंग और भौतिकवादी युग में अपने कर्तव्यों को वार्षिक कलेंडर में बाँधने के लिए शुरू हुआ हैं ! आस्ट्रेलिया , यूरोप  और अमेरिकी देशों में हुआ जहाँ अधिकांश माता-पिता को उनके बच्चे घर से बाहर सामूहिक वृद्धाश्रमो में रखते हैं और वर्ष में एक बार मदर्स और फादर्स डे के अवसर पर नके लिए उपहार लेकर उनकी कुशल क्षेम पूछने जाते हैं, इन विशेष अवसरों के आलावा शायद ही मदर्स और फादर्स डे को मनाने वाले ये लोग कभी वृद्ध माता पिता की सुध नहीं लेते..!  माँ का स्मरण कर उसके योगदान को प्रचारित करने वाला इस प्रकार के त्यौहार " मदर्स डे"  के प्रति लोगों का बढता उत्साह पिछले कुछ वर्षों से ही नजर आ रहा है लेकिन अब माँ की ममता के प्रति अचानक जागरूक हुए लोगों का उत्साह इस त्यौहार को देश में भी परंपरा की शक्ल देता नजर आ रहा है !  वैसे तो इस त्यौहार में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है लेकिन समझ में नहीं आता कि सृष्टी की जननी माँ के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए साल में सिर्फ एक ही दिन को क्यों  चुना गया है, क्या साल में एक दिन माँ के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने मात्र से माँ के त्याग और समर्पण का उधार पूरा कर लेंगे...! असल में हम कर्तव्य के बोझ तले दब कर अपराधबोध से पीड़ित होकर ऐसा कर रहे हैं, जिन्हें सच में माँ के प्रति कृतज्ञता को प्रकट करना है और उसे सही में सम्मान देना है तो इसके लिए भावनाओं को कर्म तथा सेवा में परिवर्तित करने की आवश्यकता है ना कि एक दिन हो-हल्ला मचाकर कर्तव्य की इतिश्री करने की !   माँ के त्याग और समर्पण की अगर बात की जाय तो उसके लिए एक दिन नहीं  पूरा जन्म कम पड़ जायेगा ! दरअसल भारत और भारतीय लोगों को आज़ादी के छः दशक बीत जाने के बाद भी अंग्रेजों की वैचारिक गुलामी से  मुक्ती नहीं मिल पाई है, यही वजह है कि वे भारतीय परिवेश के बजाय पाश्चात्य परिवेश भौतिकवादी परम्पराओं से प्रभावित नजर आते हैं ! माँ कहने को तो जन्म देने वली स्त्री और जन्म लेने वाले शिशु के बीच का प्राकृतिक सम्बन्ध है लेकिन भारतीय दर्शन में माँ को सृष्टी की जननी मानते हुए ईश्वर का दर्जा दिया गया है, जिसके त्याग और समर्पण की किसी से कोई तुलना नहीं के जा सकती !  दुर्भाग्य से विदेशों में बूड़े माता-पिता को वृद्धाश्रमो में छोड़ने की भौतिकवादी प्रवृत्ती के चलते जन्मे "मदर्स और फादर्स डे " अब भारत की और भी रास्ता बनाने लगे हैं और इसके लिए प्रमुख भूमिका निभाने का काम कर रही हैं ग्रीटिंग कार्ड और गिफ्ट बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ !  भारत विविध रंग-बिरंगी, लघु संस्कृतियों और उदार मन के लोगों का देश है जिससे  यहाँ के लोग बिना ज्यादा सोच विचार के नुकसान पहुँचाने वाले अतिक्रमणकारी परम्पराओं और रीति-रिवाजों को भी अपना लेते हैं ! 
सबकी माँ सदा स्वस्थ और खुश रहे,
 इन्ही शुभकामनाओं के साथ, 
अगली चर्चा तक  विदा